Wednesday, April 18, 2012

तू मेरे गाँव में आना....















लगे जब शहर अन्जाना
तू मेरे गाँव में आना...

मुहब्बत में खता अपनी
न मैं माना न वो माना ....
...
पतंगों की उड़ानों से
किसी बच्चे को बहकाना......

ये रिश्तों की तिजारत है
किसे खोना किसे पाना.....

जब अखबारी उजाले हों
मेरे ख्वाबो चले जाना.....

भुला दो बेवफाई पर
वफ़ा के अश्क बरसाना...

तबाही ! याद आता है
मुझे अब माँ का समझाना .....

मिले जब तो बहुत रोये
मैं दीवाना वो दीवाना.........

मेरे बचपन की तस्वीरें
मैं खुद को ही न पहचाना......

सचिन अग्रवाल

कभी दम तोडती ये भूख अखबारी नहीं होती.........

















दिलों में गर हमारी खुद से गद्दारी नहीं होती
तो हमने जंग कोई जीत कर हारी नहीं होती .....

वो बचपन कितना महंगा था तभी इनको बता देती
तो माँ इन चार बेटो पे कभी भारी नहीं होती......
...
यकीनन आज घर में बाप का बिस्तर नहीं होता
अगर ये पेंशन उसकी जो सरकारी नहीं होती......

निकलकर दफ्तरों से बस्तियों का सच नहीं देखा
कभी दम तोडती ये भूख अखबारी नहीं होती........

सचिन अग्रवाल















वो एक बूढा नज़र जो आ रहा है आज हम सबको
वही खादी वही टोपी वही चश्मा लगाए है ......

वो एक बूढा जिसे अब दूसरा गांधी भी कहते हैं
अहिंसा और सच्चाई के स्वर की गर्जना करते.....
...
वो एक बूढा जो अक्सर लड़ता आया है बुराई से
गरीबों और मजबूरों के हक की बात करता है.....

वो एक बूढा कि जो बिलकुल नहीं डरता सियासत से
सियासत वो कि जिसके सामने टिकता नहीं कोई............

वो एक बूढा कि जिसने घर नहीं देखा है सदियों से
न खुद की ज़िन्दगी कोई, नहीं परिवार है कोई .....

वो एक बूढा हमें दिखने में जो कमज़ोर लगता है
उसी ने लानतें भेजी हैं अक्सर नौजवानी को ..........

वो एक बूढा खड़ा है आज जो एक मसअला लेकर
अगर वो झूठ है तो क्यों सियासी छटपटाहट है ............

वो एक बूढा उठा दे हाथ तो बादल गरज़ते हैं
कि एक आवाज़ पे जिसकी कई सैलाब आते हैं........

वो एक बूढा कि जिसके साथ सारा मुल्क चलता है
हरेक बच्चा भी ये कहता है मैं अन्ना हजारे हूँ..........

वो एक बूढा मगर कुछ रोज़ से भूखा है क्यू यारो
अगर ये मुल्क की मुश्किल है फिर खामोश क्यू हो तुम .........

सियासत आँख मूंदे, कान में अंगुली दिए क्यूँ है
इसे ये मुल्क की चीखें सुनाई क्यूँ नहीं देतीं ...............

ये संसद बहरी है कुछ भी नहीं होगा हज़ारों से
ज़रुरत है कि अब घर से करोड़ों में निकल आओ...........

कि अब ये वक़्त है कुछ मसअले निपटा लिए जाएँ
इन्हें समझा दिया जाए कि ये जनतंत्र है यारो ........

यंहा जनता की मर्ज़ी के सिवा कुछ भी नहीं होगा
कि अब हिन्दोस्तां की आबरू लुटने नहीं देंगे .........

चलो इन रहनुमाओं को दिखा दे आज हद इनकी
नहीं तो ये ही रहबर मुल्क सारा बेच डालेंगे.........

वो एक बूढा कि जिसमे देखा है मैंने बुजुर्गों को
कि जैसे धूप सहता पेड़ सायादार हो कोई.............

मैं एक छोटा सा शायर और कुछ तो कह नहीं सकता
बस इतना चाहता हूँ उम्र मेरी भी उन्हें लग जाए......................

वन्दे मातरम

सचिन अग्रवाल










वो पेरिस के लिबादे थे जिन्हें खादी कहा हमने
भरम था वो जो बंटवारे को आज़ादी कहा हमने

अजब गुस्सा कि गुस्से में दुआएं भी हज़ारों थी
जब उस बूढी भिखारिन को यूँ ही दादी कहा हमने...

तेरे आँचल तले बेख़ौफ़ होके सो तो जाते हैं
गरीबी इसलिए तुझको ही शहजादी कहा हमने............


सचिन अग्रवाल









मुझे बलवाई कह देगा तुझे गद्दार कर देगा
सियासी झूठ को सच सुबह का अखबार कर देगा

यही जिद है गरीबी गर तेरी तो आजमाती रह
ये भूखा पेट हमको और भी खुद्दार कर देगा ...

बहुत मुमकिन है शायद अब भी हो वो मुन्तजिर मेरा
मैं पागल ये समझता था की वो इज़हार कर देगा

वो अब ससुराल से आकर हमेशा मुस्कुराती है
उसे लगता है सच तो माँ को और बीमार कर देगा...............
सचिन अग्रवाल

न जाने और देखेगा तमाशा आसमां कब तक.....














ये जलते घर ये चिथड़े आदमी के और धुआं कब तक
ये नफरत के निशाँ कब तक ये आतिशबाज़ियाँ कब तक.........

अगर सच की हिमायत हो तो सर के ताज का डर है
सिले हैं होठ, मुंसिफ चुप, सियासत बेज़ुबां कब तक ...

चलो देखें मुकदमों का नतीजा कब निकलता है
सुबूतों के लिए लाशें गिनेंगे हुक्मुरां कब तक .........

न जाने कितनी झुलसेगी ज़मीं एक बूँद की खातिर
न जाने और देखेगा तमाशा आसमां कब तक ..................

सचिन अग्रवाल


















सुखन लब पर मचलना चाहते हैं
सुनो पत्थर पिघलना चाहते हैं

पढो और आखिरी आंसू गिरा दो
पुराने ख़त हैं जलना चाहते हैं...

बता दो सच हमे भी ज़िन्दगी का
हमारे दिल दहलना चाहते हैं

अचानक छा गयी उसपे अमीरी
अब उसके पर निकलना चाहते हैं

ये माना है उन्हें कांटो से नफरत
गुलों को क्यों मसलना चाहते हैं

किसी घायल परिंदे को बचाकर
ये बच्चे क्या बदलना चाहते हैं.....?

सचिन अग्रवाल